Poem- अज आखां वारिस शाह नू – अमृता प्रीतम
| अज आखां वारिस शाह नू कितों कबरां विचो बोल ! ते अज किताब -ऐ -इश्क दा कोई अगला वर्का फोल ! इक रोई सी धी पंजाब दी तू लिख -लिख मारे वेन उठ दर्मंदिया दिया दर्दीआ उठ तक अपना पंजाब ! किसे ने पंजा पानीय विच दीत्ती ज़हिर रला ! जित्थे वजदी फूक प्यार दी वे ओह वन्झ्ली गई गाछ धरती ते लहू वसिया , क़ब्रण पयियाँ चोण अज सब ‘कैदों ’ बन गए , हुस्न इश्क दे चोर अज आखां वारिस शाह नून कित्तों कबरां विचो बोल ! |
एक समय पंजाब की एक बेटी (हीर) रोई थी,
और तुमने उसके दुख पर विलाप लिखे थे।
आज पंजाब की लाखों बेटियाँ रो रही हैं और वे तुम्हें पुकार रही हैं।
पंजाब की एक रोती हुई बेटी तुमसे कहती है, वारिस शाह, उठो, दुखियों के दर्द को समझने वाले, उठो और अपने पंजाब को देखो! आज खेतों और बागों में लाशें बिछी हुई हैं, और चेनाब नदी खून से भरी हुई है। उठो, दुख झेलने वालों के हमदर्द कवि, उठो और अपने पंजाब को देखो। आज खेतों और बागों में लाशें बिछी हुई हैं, और चेनाब नदी खून से भरी हुई है। किसी ने पंजाब की पाँचों नदियों में ज़हर घोल दिया है, और उस ज़हरीले पानी ने पूरी धरती को विष से सींच दिया है। जहाँ कभी प्रेम की बाँसुरी बजती थी, वह मधुर धुन अब खो गई है। रांझा के सारे साथी और भाई आज प्रेम की उस राह और परंपरा को भूल गए हैं। धरती पर हर ओर खून फैला हुआ है, और कब्रों से विलाप की आवाज़ें उठ रही हैं। प्रेम की राजकुमारियाँ (प्रेम करने वाली स्त्रियाँ) आज कब्रों और मज़ारों में रो रही हैं। आज सब लोग कैदो बन गए हैं, जो प्रेम और सुंदरता के चोर हैं। आज हम कहाँ से ढूँढ़कर वारिस शाह जैसा एक और कवि लाएँ?
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